सत्य क्या है

सत्य को जानने की उत्कंठा सभी की रहती है। प्रयास भी रहता ही है। क्या सही मायने में कोई निरपेक्ष सत्य है भी? हो ही नहीं सकता।
सारे सत्य सापेक्ष हैं। फिर कोई कहेंगे, नहीं ईश्वर निरपेक्ष हैं। ठीक है मान लिया। किन्तु ऐसा निरपेक्ष ईश्वर जो निरपेक्ष ज्ञान देगा वो कोई और धारण कहाँ करेगा? तो फिर कोई भी देहधारी परम सत्य कैसे कह सकेगा? हम जब भी कोई बात अपनी मन-बुद्धि से 'सत्य सी' प्रतीत होती कहते हैं, क्या वो किसी दूसरे को असत्य नहीं लग सकती है। और इसके विपरीत भी। तब फिर उस बात का फैसला कैसे होगा। और लोगों की राय लेकर? ले ली। पर दो गुट हो गये। अब? एकमत कहाँ हुआ? सभी प्राणियों को छोड़ो, सभी मनुष्यों में भी एकदम एकमत हो ही नहीं सकता क्योंकि सभी आत्माएं अस्तित्वीय रूप से भिन्न हैं। उनके कर्म, रोल, संबंध, भोगादि भिन्न हैं। या यों कहें कि सभी भिन्न भिन्न स्थानों पर अवस्थित हैं कालिक, स्थानिकादि दृष्टियों से। सो अलग अलग एंगेल्स से सभी को अलग अलग सा दिखेगा ही। फिर ईश्वर का क्या?
ईश्वर हमें सामान्य सत्यों से परिचित करा सकते हैं। हम कौन हैं? ये दुनिया क्या है? ये सब चल क्या रहा है? वो खुद कैसा है? आत्माएं, परमात्मा और प्रकृति तीनों सनातन सत्य मिलकर एक क्रमिक उत्पत्ति, स्थिति और विनाश का खेल खेलते ही रहते हैं। हम खिलाड़ियों को स्मृति और विस्मृति के झोंके खाते रहना होता है। हम भी और वो भी इस खेल से बंधा है। इत्यादि इत्यादि। 
चक्रीय व्यवस्थाओं में समस्त बिंदुओं व चक्र की तात्कालिक अवस्था अन्य बिन्दुओं के और अन्य क्षणों के सापेक्ष होती है। यदि शक्ति चक्र को मानना है तो सापेक्ष को तो मानना ही पड़ेगा। सारा सृष्टि रूपी नाटक मंचन सापेक्ष की भूमि मिलने पर ही संभव होता है। मतिभ्रम एवं मत भिन्नता तो सापेक्ष भूमि के अस्तित्व के कारण ही विभिन्न स्थानों से कोंण बदलने से दृष्टिकोंण बदलने के कारण दृश्य बदल जाने से  होता है। दृश्य समान होने पर भी भिन्न-भिन्न दृष्टा भिन्न भिन्न दृश्य को देखते हैं। यह सापेक्ष का जादू नहीं तो और क्या है? 'नंबरवार का कारोबार' नहीं तो और क्या है?
जीवन और मृत्यु भी सापेक्ष के दरबार की शोभा मात्र है जन्म और मृत्यु शब्द शाब्दिक अर्थ में 'असत्य से' हैं।
 जीवन का ना तो कोई अर्थ है। और ना ही वह निरर्थक है। वह तो बस है। जो केवल होता है वो ही तो सापेक्ष सत्य होता है। जबकि अनादि काल से ही हम जीवन मृत्यु का खेल खेलते आ रहे हैं तो 'यह तो बस है हमारे ही हेतु' मात्र यह भाव ही रहना चाहिए।
कुछ कहते हैं 
दुनिया बनाने वाले क्या तेरे दिल में समाई..........
काहे को तूने दुनिया बनायी....
अरे भाई हमारे खेलने के लिए अविनाशी खेल और मैदान है ये तो।
जो है सो तो है। उसपर क्यों क्यों की कैं कैं या कैसे कैसे की कों कों से कुछ होना तो है नहीं। 
तो चलो भइया चलो। खेलें? चलो। 

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